कल आज और कल

कल आज और कल

Wednesday, June 6, 2018

किसानी हड़ताल



दोस्तो, जब भी लोगों को अपनी बात सरकार से मनवानी होती है, तो वो नए- नए प्रकार के तरीको से सरकार के प्रति अपना विरोध प्रकट कर सरकार तक अपना संदेश भेजते हैं।
सही भी है, भारत एक लोकतांत्रिक देश है। और जब भी हमें लगे कि जाने अनजाने सरकारी नीतियों से हमारा अहित हो रहा है, तो हम विरोध करने के लिए स्वतंत्र भी हैं।
लेकिन हमारे विरोध करने के तरीके से किसी और का अहित न हो इस बारे में भी विचार करना आवश्यक है।
आजकल ऋण माफी एक बहुत बड़ा मुद्दा है।


अपना ऋण माफ करवाने के लिए हमारे किसान भाई सड़को पर उतर आते हैं, और सड़क पर ही दूध की नदियां बहा देते हैं।
आलू, प्याज, टमाटर आदि सब्ज़ियों को सड़कों पर फेंक देते हैं, और फिर उन सब्ज़ियों को अपने पैरों से रौद देते हैं। और सब्जियों को पैरों से रौंदते समय जय जवान जय किसान के नारे लगाते हैं।


मेरे विचार में विरोध करने का ये तरीका उचित नहीं है।

जो किसान दिन और रात में भेद न करते हुए अपना खून पसीना लगाकर फसल का उत्पादन करता है वो कभी भी अपनी फसल को पैरो से रौंदते हुए नहीं देख सकता ।

मुझे आज भी याद हैं, बचपन में मेरे पैरों के नीचे अगर कोई गेहूं का दाना भी आ जाता था, तो मेरी दादी मुझे बहुत डाँटती थी, और कहती थी उस दाने को माथे से लगाओ अर्थात उस अन्न के दाने का अपमान न करो उसके पैर छूकर माफी माँगो।

प्राचीन काल से ही हमारे देश में अन्न को देवता का स्थान दिया जाता है।

यहाँ तक कि राजा महाराजा भी खाने के समय खाने की थाली को आसन देते थे और खाने के पहले हाथ जोड़कर प्रार्थना करने के बाद ही भोजन ग्रहण करते थे।

लेकिन आज अन्न का ऐसा अपमान देखकर बहुत दुःख होता है।

आज जो लोग जय जवान जय किसान के नारे लगा रहे हैं ।

क्या वो इन नारों के महत्व को समझते हैं ??
क्या उन्हें यह पता भी है कि इस नारे को कब और किसने कहा था ??

शायद नहीं ।।
क्योंकि अगर वो समझते तो इस नारे का भी अपमान नहीं करते ।

दोस्तों जय जवान जय किसान का नारा हमारे देश के पूर्व प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान दिया था, और उस समय हमारा देश खाद्यान की भारी कमी से भी जूझ रहा था ।


शास्त्री जी के नारे से हमारी सेना और किसानों में गजब का जोश और उत्साह भर गया ।
और भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना की ईंट से ईंट बजा दी, और किसानों ने कठिन परिश्रम से भारत को खाद्यान में स्वावलंबी बना दिया ।
क्या आज हम अपने उस गौरवशाली इतिहास को भी भूल गए हैं ??
जो लोग आज सड़को पर उतर कर इस तरह से अन्न का अपमान कर रहे है निसंदेह वो लोग भारतीय किसान नहीं हैं।

वो बस किसान होने का छलावा कर रहे हैं। उन्हें इस बात की भी परवाह नही है, कि इस प्रकार अन्न बर्बाद करने से कितने लोगों को भूखा सोना पड़ेगा। 

सभी किसान भाइयों से मेरा निवेदन है, कि आप लोग हड़ताल का कोई और विकल्प तलाश कर लें, पर हड़ताल करने का ये तरीका सही नहीं है।

दोस्तों आप लोग भी इस प्रकार की हड़ताल पर अपने विचारों से मुझे अवगत कराइये ।।


धन्यवाद ।।

No comments:

Post a Comment