कल आज और कल

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Saturday, June 22, 2019

बैंक कर्मचारी और उनकी सुरक्षा




दोस्तों हम सभी लोग , बैंक कर्मचारी और उनके द्वारा  किये जाने वाले कार्यों  से भली प्रकार परिचित हैं।
ये वही लोग हैं, जिन्होंने देश के सबसे बड़े स्वच्छ भारत अभियान अर्थात नोटबन्दी में बिना रुके, बिना थके अर्थव्यवस्था की सफाई में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था ।

ये लोग सफाई हेतु सुबह 9 बजे आ जाते थे और रात के 2 बजे तक लगातार काम करते रहते थे ।

लेकिन ये सब बाते  हम लोग भूल चुके हैं, क्योंकि ये सब  बातें  पुरानी हो चुकी हैं।

आज बैंक शाखा में प्रवेश करने वाला हर दूसरा ग्राहक यही कहता है, कि  भाई आप लोग की नौकरी सबसे अच्छी है, मस्त A.C. में बैठे रहतें हैं, दिन भर और हर रविववार छुट्टी, मज़े हैं भाई आप लोग के तो।  

ख़ैर उन्हें कौन समझाए A C में बैठकर गोली खाने से अच्छा है, धूप में सुरक्षित खड़े रहना ।

दोस्तों बैंक  कर्मचारियों के साथ गाली गलौज, हाथापाई, ये सब तो आम बात है, लेकिन बैंक कर्मचारियों की हत्या की बढ़ती हुई घटनाएं एक संकट का विषय बन चुकी  हैं।  

अभी हाल ही में विजया बैंक के एक अधिकारी की दो बन्दूक धारियों ने गोली मार कर हत्या कर दी।  

दो लोग हेलमेट पहनकर और हाथ में रिवॉल्वर लेकर शाखा में प्रवेश करते हैं, और अधिकारी की हत्या करके आराम से भाग जाते हैं।  



बैंक में हेलमेट पहनकर या मुँह बाँध कर प्रवेश करना  निषेध है, लेकिन फिर भी लोग ऐसा करते हैं, और अगर कोई बैंक कर्मचारी उन्हें टोक दे तो लड़ने लगते हैं।

 बैंक शाखा में गार्ड केवल सुबह १० से शाम 5  बजे तक ही रहते हैं यानी कैश के खुलने से लेकर कैश  के बंद होने के समय तक,  जबकि शाखा तो 8  बजे तक खुली रहती हैं।  

क्या बैंक शाखा में गार्ड केवल कैश की सुरक्षा हेतु ही नियुक्त किये गए हैं ? क्या कर्मचारी की जान की कोई कीमत नहीं है ?

क्या बैंक कर्मचारी की सुरक्षा हेतु कोई कानून नहीं हैं ?

क्या ये सवाल नहीं उठने चाहिए ?

देश में जब भी कोई आपदा आती हैं, तो बैंक कर्मचारियों के एक-दो दिन का वेतन काट लिया जाता हैं और उस आपदा से निपटने के लिए प्रयोग किया जाता हैं।  

आज बैंक कर्मचारियों पर आपदा आयी हैं, क्या किसी विभाग ने उस दुखी परिवार के लिए अपने एक दिन का वेतन दान किया हैं ?

ये इस तरह की कोई पहली घटना नहीं है, आये दिन इस प्रकार की घटनाएं घटित  होती रहती हैं, लेकिन आम आदमी की नज़र में नहीं आती, क्योंकि कोई न्यूज़ चैनल इस प्रकार की  घटनाओ को प्रसारित नहीं करता  है, और न ही कोई अखबार इसे छापता हैं , अगर कोई अखबार छापता भी है, तो किसी ऐसे कोने में जहाँ आसानी से आपकी नज़र भी नहीं जाएगी।

बैंक यूनियने भी इस तरह की घटनाओ का कोई विरोध करती नज़र नहीं आती हैं।  कारण कोई भी हो लेकिन बैंक कर्मचारियों की इस प्रकार हो रही ये हत्याएं असहनीय हैं।

अभी हाल ही में पश्चिम बंगाल में कुछ जूनियर डॉक्टर्स के साथ हुई झड़प का क्या परिणाम हुआ, उससे पूरा देश  भली प्रकार परिचित हैं।  

क्या ये हमारी बैंक यूनियनों का कर्तव्य नहीं, की वो एकजुट होकर इस घटना का विरोध करें ?

इस प्रकार बैंक  कर्मचारियों की हो रही ये हत्याएं असहनीय हैं, और सभी को मिलकर इसका विरोध करना चाहिए, और कठोर से कठोर कदम उठाने चाहिए।  


Sunday, January 6, 2019

मैं और मेरा टिफिन


दोस्तों टिफ़िन से तो आप सभी लोग भली - भांति परिचित ही हैं।
टिफ़िन, लंच बॉक्स, डब्बा, सब वही तो है, जिसमे हम सभी लोग खाना ले जाते हैं।
दोस्तों, ये डब्बा ना.... बड़े ही काम की चीज़ है।

आपको दुनिया में कहीं भी जाना हो, चाहे सफ़र में, चाहे ऑफिस या फिर स्कूल, डब्बा हर जगह आपका साथ निभाता है।

दोस्तों मेरा और मेरे टिफ़िन का रिश्ता स्कूल के दिनों से शुरू हुआ, जो आज तक उसी तरह क़ायम है, जैसा कि स्कूल के दिनों में था ।

स्कूल के दिनों में मम्मी रोज़ सुबह अच्छा - अच्छा खाना बना कर टिफ़िन में देती थी, और स्कूल में हम सारे दोस्त एक साथ बैठ कर खाते थे ।



जिसको जो अच्छा लगता था, हम एक दूसरे के टिफ़िन से निकाल कर खा लेते थे ।

हम रोज़ स्कूल में ही तय कर लेते थे, कि कल सबको अपने - अपने घर से क्या लेकर आना है। और अगले दिन सब वही लेकर आते थे, और मज़े से खाते थे ।

आज भी, जबकि मैं नौकरी करने लगा हूँ, लेकिन मेरा और मेरे टिफ़िन का रिश्ता  वैसा ही है, जैसा कि स्कूल के दिनों में था ।

आज भी मैं सुबह तैयार होता हूँ, और टिफ़िन लेकर ही ऑफिस जाता हूँ, और वहाँ सभी सहकर्मियों के साथ बैठ कर मज़े से खाना खाता हूँ। 

सहकर्मियों के साथ बैठ कर खाने से जहाँ एक तरफ खाने का स्वाद कई गुना बढ़ जाता है, वहीं दूसरी तरफ एक दूसरे को समझने का उनके साथ समय बिताने का भी अवसर मिल जाता है, जिससे आपसी प्रेम सम्बंध और भी प्रगाढ़ होते हैं।

एक दूसरे के टिफ़िन से छीन कर खाने का मज़ा तो बस साथ में बैठ कर खाने से ही आता है।


लेकिन दोस्तों कुछ लोगों का नज़रिया टिफ़िन को लेकर बहुत अच्छा नहीं होता है !

शायद वो टिफ़िन लेकर जाने में खुद का अपमान समझते हैं।

या फिर वो ये सोचते हैं, कि कौन ? इस डब्बे को इतनी दूर लाद कर ले जाए !

और कुछ लोग तो इतने चटोरे होते हैं कि, वो सोचते है, टिफ़िन लाद कर ले जाने से अच्छा है, कि बाहर जाकर कुछ अच्छा सा तड़कता भड़कता खाएंगे।
और इस चक्कर में वो घर का स्वादिष्ट खाना न ले जाकर, बाहर का धूल से तड़कता और धूप में भड़कता खाना - खाना पसन्द करते हैं।

और बहुत से लोग तो बस इसलिए टिफ़िन लेकर नहीं आते, कि उनके साथी मित्र क्या कहेंगे ?  
कि ये अभी भी छोटा बच्चा है ! ये अभी भी टिफ़िन लेकर आता है... कितनी..... भूख लगती है इसको ?

अरे भाई कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना.......

तो ....दोस्तों मेरी मानिए तो ये सब बेकार की बातें हैं । इनको भूल कर आगे बढ़िए, और आपका अपना मन है, आपकी अपनी भूख है, और आपका अपना खाना है, जितना मन आए दबा के खाइये ।


और वैसे भी हमें घर का पौष्टिक और स्वादिष्ट भोजन ही खाना चाहिए, और ले भी जाना चाहिए ।
टिफ़िन का अपना अलग ही मज़ा है। और दोस्तों के साथ बैठ कर खाने से ये मज़ा और भी बढ़ जाता है।


कमेंट बॉक्स में कमेंट करके अपनी राय अवश्य दे । 
यही मेरे लिए मेरा पुरस्कार है।
धन्यवाद ।।

Sunday, August 19, 2018

बैंको में पांच दिवसीय कार्यप्रणाली : Five days working in banks




दोस्तों पिछले कई वर्षों से बैंक कर्मचारी लगातार बैंको में पांच दिवसीय कार्यप्रणाली की मांग कर रहे हैं, लेकिन अभी तक उनकी ये मांग पूरी नहीं हो पाई है।
ख़ैर देखिए उनकी मांगें कब पूरी होती हैं, लेकिन आज मैं आपको पांच दिवसीय कार्यप्रणाली के विषय में कुछ बताना चाहता हूँ ।


दोस्तों पांच दिवसीय कार्यप्रणाली को लागू करने का पूरा श्रेय फोर्ड कंपनी के जनक श्री हेनरी फोर्ड को जाता है।
एक बार फोर्ड कंपनी के सभी अच्छे कर्मचारी काम करने के बढ़ते समय के कारण एक एक करके नौकरी छोड़कर जाने लगे ।




इस बात से हेनरी फोर्ड बहुत परेशान हो गए, और उन्होंने सबके नौकरी छोड़ने के कारण का पता लगाया । कारण जानने के बाद उन्होंने, परिणामस्वरूप सभी कर्मचारियों का वेतन दोगुना कर दिया, और सप्ताह में पांच दिवसीय और आठ घंटे प्रति दिन की कार्यप्रणाली लागू कर दी । जिसके बाद उनके सभी कर्मचारी वापस आ गए, और उनकी कंपनी की उत्पादन क्षमता भी बढ़ गयी ।




यूनाइटेड स्टेट्स के राष्ट्रपति श्री हर्बर्ट हूवर ने देश में आई मंदी के प्रभाव को कम करने के लिए अपने कर्मचारियों को नौकरी से निकालने के बजाए उनके कार्य करने के घंटो में कमी कर दी ।

दोस्तों विकसित राष्ट्रों में ऐसे कई उदाहरण हैं, जिन्होंने कार्य करने के समय में कमी करके विकास किया है।
हमारा सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी देश चीन, हंगरी, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया आदि, जैसे विकसित राष्ट्र भी पांच दिवसीय कार्यप्रणाली के आधार पर ही कार्य करते हैं।

दोस्तों पांच दिवसीय कार्यप्रणाली लागू होने से बहुत सारे लाभ भी हैं, जैसे : कम ईंधन लागत, व यातायात में कमी, ये पर्यावरण के भी अनुकूल है।
उत्पादकता में वृद्धि जो कि बैंक और राष्ट्र दोनों के लिए लाभकारी है।

कर्मचारी की अनुपस्थिति में कमी, मजबूत मनोबल और बेहतर नौकरी करने की संतुष्टि ।

कर्मचारी की ऊर्जा लागत में कमी, जीवन स्तर और स्वास्थ्य स्तर में सुधार ।
बेहतर कार्य और निजी जीवन के मध्य समन्वय आदि ।




आज बैंको में डिजिटलीकरण इतना अधिक हो चुका है, कि ग्राहक बिना शाखा गए ही अपने सारे कार्य (24 *7) किसी भी स्थान से आसानी से कर सकते हैं ।
जैसे कि एटीएम मशीन,कैश डिपाजिट मशीन, इंटरनेट बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग, चेक डिपाजिट मशीन, यहां तक कि ग्राहक घर बैठ कर ही अपना बचत खाता, डिपॉजिट खाता आदि भी खोल सकते हैं।

दोस्तो पांच दिवसीय कार्यप्रणाली लागू हो जाने से बैंक अपनी शाखाओं का अधिक  विस्तार न करके बल्कि अपनी ई-लॉबी के विस्तार पर अधिक ध्यान देंगे।
जो कि बैंको के लिए भी लाभकारी है, क्योंकि एक शाखा को खोलने में जितना धन खर्च होता है, उतने धन में बैंक तीन ई-लॉबी खोल सकते हैं।





दोस्तों ई-लॉबी एक ऐसा स्थान हैं जहां आपको एटीएम मशीन, पास बुक प्रिन्टिंग मशीन, कैश डिपाजिट मशीन, चेक क्लीयरिंग मशीन आदि की सुविधाएं प्राप्त होती हैं।

किन्तु अब तक ये बैंको में लागू क्यों नही हुआ ??

क्योंकि सरकार ये सोचती है कि, इस प्रणाली से नौकरीपेशा वर्ग और उद्योग जगत को बहुत सी कठिनाइयां होंगी ।और फिर सरकार की बहुत सी योजनाएं भी हैं,जो केवल बैंको के माध्यम से ही संचालित होती हैं।

तो दोस्तों इन बेमानी बातों का उत्तर हम ऊपर ही पढ़ चुके हैं कि,डिजिटलाइजेशन को बढ़ाकर हम इन सभी परेशानियों को दूर कर सकते हैं।


दोस्तों आप लोगों को ये ब्लॉग कैसा लगा कमेंट करके अवश्य बताइये ।


और इसे अधिक से अधिक शेयर कीजिये ताकि लोग इसके सकारात्मक पहलू को जान सके ।।



धन्यवाद ।।


Wednesday, June 6, 2018

किसानी हड़ताल



दोस्तो, जब भी लोगों को अपनी बात सरकार से मनवानी होती है, तो वो नए- नए प्रकार के तरीको से सरकार के प्रति अपना विरोध प्रकट कर सरकार तक अपना संदेश भेजते हैं।
सही भी है, भारत एक लोकतांत्रिक देश है। और जब भी हमें लगे कि जाने अनजाने सरकारी नीतियों से हमारा अहित हो रहा है, तो हम विरोध करने के लिए स्वतंत्र भी हैं।
लेकिन हमारे विरोध करने के तरीके से किसी और का अहित न हो इस बारे में भी विचार करना आवश्यक है।
आजकल ऋण माफी एक बहुत बड़ा मुद्दा है।


अपना ऋण माफ करवाने के लिए हमारे किसान भाई सड़को पर उतर आते हैं, और सड़क पर ही दूध की नदियां बहा देते हैं।
आलू, प्याज, टमाटर आदि सब्ज़ियों को सड़कों पर फेंक देते हैं, और फिर उन सब्ज़ियों को अपने पैरों से रौद देते हैं। और सब्जियों को पैरों से रौंदते समय जय जवान जय किसान के नारे लगाते हैं।


मेरे विचार में विरोध करने का ये तरीका उचित नहीं है।

जो किसान दिन और रात में भेद न करते हुए अपना खून पसीना लगाकर फसल का उत्पादन करता है वो कभी भी अपनी फसल को पैरो से रौंदते हुए नहीं देख सकता ।

मुझे आज भी याद हैं, बचपन में मेरे पैरों के नीचे अगर कोई गेहूं का दाना भी आ जाता था, तो मेरी दादी मुझे बहुत डाँटती थी, और कहती थी उस दाने को माथे से लगाओ अर्थात उस अन्न के दाने का अपमान न करो उसके पैर छूकर माफी माँगो।

प्राचीन काल से ही हमारे देश में अन्न को देवता का स्थान दिया जाता है।

यहाँ तक कि राजा महाराजा भी खाने के समय खाने की थाली को आसन देते थे और खाने के पहले हाथ जोड़कर प्रार्थना करने के बाद ही भोजन ग्रहण करते थे।

लेकिन आज अन्न का ऐसा अपमान देखकर बहुत दुःख होता है।

आज जो लोग जय जवान जय किसान के नारे लगा रहे हैं ।

क्या वो इन नारों के महत्व को समझते हैं ??
क्या उन्हें यह पता भी है कि इस नारे को कब और किसने कहा था ??

शायद नहीं ।।
क्योंकि अगर वो समझते तो इस नारे का भी अपमान नहीं करते ।

दोस्तों जय जवान जय किसान का नारा हमारे देश के पूर्व प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान दिया था, और उस समय हमारा देश खाद्यान की भारी कमी से भी जूझ रहा था ।


शास्त्री जी के नारे से हमारी सेना और किसानों में गजब का जोश और उत्साह भर गया ।
और भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना की ईंट से ईंट बजा दी, और किसानों ने कठिन परिश्रम से भारत को खाद्यान में स्वावलंबी बना दिया ।
क्या आज हम अपने उस गौरवशाली इतिहास को भी भूल गए हैं ??
जो लोग आज सड़को पर उतर कर इस तरह से अन्न का अपमान कर रहे है निसंदेह वो लोग भारतीय किसान नहीं हैं।

वो बस किसान होने का छलावा कर रहे हैं। उन्हें इस बात की भी परवाह नही है, कि इस प्रकार अन्न बर्बाद करने से कितने लोगों को भूखा सोना पड़ेगा। 

सभी किसान भाइयों से मेरा निवेदन है, कि आप लोग हड़ताल का कोई और विकल्प तलाश कर लें, पर हड़ताल करने का ये तरीका सही नहीं है।

दोस्तों आप लोग भी इस प्रकार की हड़ताल पर अपने विचारों से मुझे अवगत कराइये ।।


धन्यवाद ।।

Saturday, December 9, 2017

वृद्धाश्रम : कल आज और कल



दोस्तों वृद्धाश्रम (old age home) का सन्धि विक्षेद है : वृद्ध + आश्रम यानी वृद्धों का आश्रम।
अर्थात एक ऐसा आश्रम या स्थान जहाँ पर वृद्धो को रखा जाता है, और उनकी देखभाल की जाती है। 
अगर हम चाहे तो ये भी कह सकते है कि वृद्धाश्रम बूढ़े माँ बाप का हॉस्टल (hostel) होता है।

बचपन में माँ बाप अपने बच्चों को पढ़ा लिखाकर  उनका भविष्य सँवारने की चाह में उन्हें  हॉस्टल भेजते हैं, लेकिन वही बच्चे जब पढ़ लिख कर बड़े हो जाते हैं,  तो वे अपने माँ बाप को उम्र के उस पड़ाव पर हॉस्टल यानी वृद्धाश्रम भेज देते हैं, जब उन्हें उन बच्चों की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। 
वृद्धावस्था में माता पिता को अपने बच्चो के प्यार, साथ और सम्मान की अत्यधिक आवश्यकता होती है, किन्तु कुछ बच्चे इस बात को नहीं समझते हैं।
दोस्तों, जहाँ तक मुझे जानकारी है कि, पहले हमारे भारतवर्ष में वृद्धाश्रम नहीं हुआ करते थे। बल्कि  यहाँ पर श्रवण कुमार और भगवान श्री राम और लक्ष्मण जैसे सुपुत्र जन्म लिया करते थे।


ये उन्ही श्रवण कुमार का देश है जिन्होंने अपने अंधे माँ बाप की चार धाम घूमने की इच्छा को पूरा करने के लिए उन्हें अपने कंधे पर तराजूनुमा पालकी में बैठाकर पैदल ही चार धाम की यात्रा कराई थी।
ये उन्ही भगवान राम का देश है, जिन्होंने अपने पिता द्वारा दिये गए वचन को पूरा करने के लिए अपने जीवन के अनमोल चौदह वर्ष अपनी पत्नी माता सीता और भ्राता लक्ष्मण के साथ वन में बिता दिए थे।
ये वही देश हैं, जहाँ पर, "माता पिता के चरणों में ही स्वर्ग होता है", और "माता पिता साक्षात ईश्वर का स्वरूप हैं", जैसी कहावतें प्रचलित हैं।

प्रभु परशुराम ने अपने पिता की आज्ञा को पूरा करने के लिए अपनी ही माता और भाइयों का सिर उनके धड़ से अलग कर दिया था। और बाद में पिता से ही वरदान स्वरूप उन्होंने सभी को जीवित भी करा लिया था। इसलिए उनको सबसे बड़ा पितृभक्त भी कहा जाता हैं।
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किन्तु, आजकल परिवार में तो जैसे संस्कार और बड़े छोटे का आदर व सम्मान समाप्त ही हो गया है।
बच्चे जल्दी से माता पिता के मांगने पर एक ग्लास पानी भी नही देते हैं, क्योंकि आज के समय में बच्चे अपने माता पिता को बोझ समझते हैं।
वे समझते हैं कि उनके माता पिता उनकी तरक्की में रुकावट हैं, क्योंकि वो उन्हें हर काम के लिए टोकते हैं, और उनकी तरक्की से जलते हैं।
अधिकतर बच्चे अपने माता पिता को अपने दोस्तों और अपने वरिष्ठ अधिकारियों से मिलाने में भी शरमाते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि उनके  माता पिता उनकी बेइज्जती करा देंगे।
और तो और अगर पिता जी ने बच्चे को डांट भी  दिया, तो बच्चा उल्टा पिता जी को ही डाँटने लगता है, जैसे कि वो खुद ही अपने पिता का पिता हो।
कुछ बच्चे तो ज़रा-ज़रा सी बात में ही, अपने माता पिता को घर से भगाने लगते हैं। जैसे कि घर उन्होंने खुद ही खरीदा और बनवाया हो। 

और संस्कारों की सारी सीमाएं तो तब पार हो जाती हैं, जब अपने क्रोध में वो अपने माता पिता पर हाथ उठाने से भी पीछे नहीं हटते।
जब कोई मित्र उनसे पूछता है कि, क्या हुआ भाई ?  मूड ऑफ क्यों लग रहा है, तुम्हारा तो बड़े गर्व से बताते है, कुछ नहीं यार, बाप से ज़रा हाय हाय हो गयी थी, और उसी में दो हाथ मैने भी उनको लगा दिए, और बिना खाना खाए ऐसे ही चला आया घर से ।
अपने मित्रो से इस प्रकार खुद ही अपनी प्रसंशा करते हुए न तो उन्हें लज्जा आती है, और न ही अपने किये का पछ्तावा होता है।

प्रत्येक माता पिता अपनी संतान को अपनी पूरी सामर्थ्य लगाकर पाल पोस कर बड़ा करते हैं। अपनी संतान के लिए बड़े बड़े सपने सजाते हैं। दुनिया भर की सारी खुशियां अपने बच्चों को देते हैं। धूम धाम से उनका शादी विवाह भी कराते हैं। किन्तु वही संतान विवाह के बाद अपने माँ बाप के सारे बलिदानों को भूल जाता है।
और जब उसे माता पिता की सेवा करनी चाहिए तब वह उन्हें वृद्धाश्रम छोड़ आता है। कुछ दिन पहले बने सम्बन्ध के लिए वो अपने वर्षो के सम्बन्ध को ठुकरा देता है।
मजबूर माँ बाप अपने बच्चे के सामने रोते बिलखते हैं, बेटा हमें भी साथ में रहने दो, हम यहीं किसी कोने में पड़े रहेंगे, और बचपन से हमने ही तो आपको पाल पोस कर बड़ा किया हैं।
तो बेटा कहता हैं  : पाल पोश कर बड़ा किया है, तो कोई अहसान नहीं किया, सभी माँ बाप करते हैं, अपने बच्चो के लिए, और ये तो आपका कर्त्तव्य हैं।

ये बात सही हैं कि ये उनका कर्तव्य है और उन्होंने इसका भली भांति निर्वाह भी किया।

किन्तु आपने क्या किया ?? 
क्या आपने अपने कर्तव्य का निर्वाह किया ??

आप तो उन्हें छोड़ आये वृद्धाश्रम, और दोबारा देखने भी नहीं गए कि वो लोग कैसे हैं। ज़िंदा भी हैं या मर गए । कैसे रहते हैं, क्या करते हैं, खाना खाते भी हैं या नहीं।


जो माँ बाप बचपन में आपके खाना न खाने पर आपके पीछे खाने की थाली लिए लिए लिए दौड़ते थे, कि बेटा, खाना खा लो, न पूरा खा पाओ तो थोड़ा ही खा लो, आज आप उनको ही भूल गए ।

दोस्तो ज़रा एक बार सोच कर देखिए, उन माँ बाप पर क्या गुज़रती होगी, जिसकी संतान उन्हें उन्ही के घर से निकालकर वृद्धाश्रम में छोड़ आये। 
शायद हम यह भूल चुके हैं, की माँ बाप कभी अपनी संतान का बुरा नहीं सोचते, कभी अपने बच्चे की तरक्की से नहीं जलते, वो तो बस आपके लिए चिंतित रहते हैं, और आपको सुखी देखना चाहते हैं, अगर वो आप पर हाथ भी उठाते हैं, तो वो भी आपकी भलाई के लिए । 

याद रखिये जो व्यवहार हम अपने माता पिता के साथ करेंगे, वही व्यवहार हमारी संतान भी हमारे साथ करेगी ।

अगर आज हम अपने माता पिता को वृद्धाश्रम भेज रहें हैं, तो कल हमारी संतान भी हमें वहीं भेज देगी। क्योंकि संतान अपने माता पिता से ही तो सर्वाधिक शिक्षित होती है।
इसलिए हमें अपनी संतान को अच्छे संस्कार देने चाहिए, और उन्हें बड़ो का आदर और सम्मान करना भी सीखाना चाहिए ।


वृद्धाश्रम बूढ़े माँ बाप के लिए न तो एक बेहतर स्थान है, और न ही हॉस्टल, बल्कि ये उनके लिए एक जेल हैं जहाँ वो बस सज़ा काटते हैं।

जिस दिन हम सभी बच्चे अपने माँ बाप का सम्मान करेंगे, उन्हें प्यार देंगे, अच्छे बुरे में उनकी सलाह लेंगे, उनकी सेवा करेंगे, उस दिन सारे वृद्धाश्रम अपने आप ही बंद हो जायेंगे ।

आइये आज हम सब मिलकर यह कसम खाए की माँ बाप को कभी दुःख नहीं देंगे और सदैव उनकी सेवा करेंगे।

मेरे विचारों पर अपनी सहमति और असहमति कमेंट के माध्यम से अवश्य प्रकट करे 
                                                    
                                         ।।  धन्यवाद  ।।




Saturday, November 25, 2017

चिकित्सक : कल आज और कल



दोस्तों चिकित्सक या डॉक्टर एक ऐसा व्यक्ति होता है, जो अपने ज्ञान और अनुभव के आधार पर हमारे अस्वस्थ हो जाने पर विभिन्न प्रकार की औषधियों के माध्यम से एक निर्धारित शुल्क लेकर हमें स्वस्थ कर देता है। चिकित्सक द्वारा इस प्रकार किये गए उपचार को चिकित्सा कहा जाता है।
हमारे समाज में चिकित्सक को भगवान का दर्जा दिया जाता है। और उपयुक्त सम्मान किया जाता है |
जब भी हम लोगों को खांसी, बुखार, वायरल या अन्य किसी प्रकार के रोग हो जाते है, तो हम लोग बिना देरी किये तत्काल चिकित्सक के पास जाकर अपना इलाज कराते हैं।

क्या आपको पता है कि, पहले जब चिकित्सा के  क्षेत्र में इतना विकास नहीं हुआ था, तो लोग उपचार कैसे कराते थे ?

पहले लोगों का उपचार आयुर्वेदिक पद्धति से वैद्य जी द्वारा किया जाता था। तीन चार गावों में एक ही वैद्य जी हुआ करते थे, जो गाँव के लोगो का उपचार किया करते थे। लेकिन वैद्य जी भी केवल छोटी मोटी बीमारियों का ही उपचार कर पाते थे, और गंभीर बीमारियों की दशा में रोगी की मृत्यु भी हो जाती थी। कुछ वैद्य सभी प्रकार के रोगों का इलाज़ करने में सक्षम थे, लेकिन उनकी संख्या बहुत कम होती थी, पहले  बाह्य उपचार अधिक प्रचलन में था, क्योंकि शल्य चिकित्सा में असहनीय दर्द होता था, और इसका विकास तथा अनुसंधान प्रारंभिक दौर से गुज़र रहा था।


ऐसा नहीं है, कि जड़ी बूटियां फायदेमंद नहीं होती थी, किन्तु हाँ, असर होने में समय अवश्य लगता था, और तब तक देर हो जाती थी। आजकल विज्ञान की सहायता से चिकित्सा के क्षेत्र में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है।
आज विभिन्न प्रकार की जाँचो के माध्यम से रोगी के रोगों का पहले ही पता लगा लिया जाता है, और  समय पर उपचार देकर उसे पूर्णतः स्वस्थ भी कर दिया जाता है।
किन्तु गाँवो में चिकित्सा की व्यवस्था आज भी अत्यंत दयनीय है।
गाँवो में न तो अच्छे चिकित्सालय है, और न ही अच्छे चिकित्सक।
मुझे आज भी अच्छे से याद है, कि जब मैं और मेरा भाई छोटे थे, तो हमारा पूरा परिवार गाँव में ही निवास करता था। और सर्दियों की गलन भरी रातों में जब हम अचानक बीमार पड़ जाते थे, तो मेरी माँ, मेरे चाचा जी के साथ साईकल के पीछे कैरियर पर मुझे लेकर बैठ जाती थी, और मेरे चाचा जी रात में ही घर से 25 - 30 किलोमीटर दूर चिकित्सक के पास जाकर मेरा उपचार कराते थे।
गाँव में या उसके आस पास किसी भी चिकित्सक के न होने के कारण उनको इतनी दूर भूखे-प्यासे कड़ाके की ठंड में साईकल चलाकर जाना पड़ता था। कभी उनके पास चिकित्सक को देने के लिए पैसे होते थे और कभी नहीं।
किन्तु फिर भी चिकित्सक महोदय उपचार कर दिया करते थे, और कहते थे, बाद में जब हो जाये तब आ कर दे जाना या फिर जब अगली बार आना तब दे देना।
किन्तु आजकल की परिस्थियां बिल्कुल भिन्न हैं आज गाँवो में चिकित्सक तो हैं लेकिन गुमराह करने वाले और पैसे ऐठने वाले ।
कुछ लोग जो शहर में किसी अच्छे चिकित्सक के यहाँ कम्पाउण्डर होते है, वो गाँव में जाकर चिकित्सक बन जाते हैं और भोले भाले लोगों के जीवन के साथ खिलवाड़ करते हैं।


पैसा कमाने के लिए कुछ लोग शहरों में आकर किसी पैथोलॉजी में कुछ दिन काम करके, एक दो चीज़े सीख लेते हैं, और गाँव में जाकर खुद की पैथोलॉजी खोल लेते हैं, और खुद चिकित्सक बन जाते हैं।
वो झोलाछाप चिकित्सक, मरीजों को उन्ही झोलाछाप पैथोलॉजी वालो के यहां जांच कराने को बोलते हैं। 
भोला भाला मरीज ठीक होने के लिए जांच कराता है और फिर वो पैथोलॉजी वाले उन्हें जांच की रिपोर्ट भी देते हैं। लेकिन उस रिपोर्ट पर न तो चिकित्सक का नाम होता है, न ही हस्ताक्षर और न ही मुहर
और इसी फ़र्ज़ी जाँच के आधार पर वो झोलाछाप चिकित्सक मरीज का उपचार करना प्रारंभ भी कर देते हैं। और पैसे ऐंठने के बाद  जब मरीज़ को फ़ायदा नहीं होता है तो उसे दूसरे चिकित्सक के पास जाने की सलाह देते हैं।
सरकारी चिकित्सालय के चिकित्सक अच्छे व अनुभव से परिपूर्ण होते हैं किंतु वहाँ पर भीड़ इतनी होती है कि आपको दिखाने में दो दिन तो लग ही जायेंगे।
और प्राइवेट चिकित्सालयों में महँगाई इतनी होती है कि सभी वर्गों के लिए प्राइवेट चिकित्सालयों में इलाज कराना संभव नही है। भिन्न भिन्न प्राइवेट चिकित्सालयों में एक ही बीमारी और एक ही जांच के मूल्यों में अंतर पाया जाता है। 
इस बात में कोई संदेह नहीं कि चिकित्सक बनने के लिए कठोर परिश्रम करना पड़ता है, और कॉलेज और कोचिंग की फीस में पर्याप्त धन भी खर्च हो जाता है। किंतु चिकित्सक बनने के बाद सारा धन तत्काल वापस पाने की चाह में इलाज महंगा कर देना अच्छी बात नहीं। चिकित्सक के मन में चिकित्सा के समय धन पाने की चाह के साथ सेवा भाव का होना भी आवश्यक है।


दोस्तों सेहत हमारी है, इसलिए सजग भी हमें ही रहना होगा।
एक बहुत पुरानी कहावत भी है : जान है तो जहान है।
हमें अच्छे और अनुभवी चिकित्सक के पास ही उपचार कराना चाहिए, और रोग के बारे में चिकित्सक से आवश्यक जानकारी भी प्राप्त करनी चाहिए।
जिस प्रकार हम अन्य योजनाओं के लिए पैसे बचाते हैं, उसी प्रकार हमे बीमारियों के लिए भी अलग से बचत या निवेश करना चाहिए।
सरकार को भी चिकित्सा क्षेत्र के लिए ऐसे कानून बनाने चाहिए, जिससे इस प्रकार के झोलाछाप चिकित्सको पर लगाम लगे, और प्राइवेट चिकित्सालयों की मनमानी रुके।
चिकित्सा प्रत्येक जीव का  मूलभूत अधिकार है चाहे वह मनुष्य हो या पशु |
जिस दिन अधिकतर लोग  स्वस्थ होंगे, तभी एक अच्छे समाज और विकसित राष्ट्र का निर्माण हो सकता है।

                      स्वस्थ रहें । मस्त रहें ।।

दोस्तो आप लोग भी चिकित्सक और चिकित्सा पर अपने विचारों से मुझे अवश्य अवगत कराएं। 
आपके विचारों की प्रतीक्षा में ।।

Saturday, November 18, 2017

यातायात : कल आज और कल


दोस्तों, जैसा कि आप सभी लोग जानते हैं, कि यातायात के माध्यम से हम लोग एक जगह से दूसरी जगह आसानी से यात्रा कर सकते हैं। 
आज हमारे पास यातायात के अनेक साधन उपलब्ध हैं, जैसे :- साईकल, मोटर साइकिल, कार, बस, ट्रेन, हवाई जहाज, ऑटो, टैक्सी आदि जिनकी सहायता से हम लोग एक स्थान से दूसरे स्थान तक आसानी से आ और जा सकते हैं।

लेकिन दोस्तों ज़रा सोचिए, "अगर आपके पास यातायात के लिए इनमें से कोई भी साधन उपलब्ध न हो "!

यह सोचकर ही, ऐसा लगता है, की "ज़िंदगी मानो एक ही स्थान पर ठहर सी गयी हो।"

दोस्तों पहले, जब यातायात के इन साधनों का अविष्कार भी नहीं हुआ था, तब लोग पैदल ही आवागमन किया करते थे। एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने में उन्हें कई-कई दिन और रात लग जाते थे। दिन भर वो लोग चलते थे, और रात में रास्ते में ही कहीं, उचित स्थान देखकर रुक जाते थे, और रास्ते के लिए जो सत्तू , चना या चबैना घर से बांधकर लेकर चलते थे, उसको खाकर रात में विश्राम कर लिया करते थे, और सुबह उठकर  फिर यात्रा प्रारंभ कर दिया करते थे ।

बैल गाडी

कई लोग घोड़े, हाथी, ऊँट और बैलगाड़ी आदि का भी प्रयोग यातायात के लिए करते थे।  किन्तु अधिकतर लोग बैल, घोड़े और हाथी जैसे पालतू जानवर भी नहीं रख पाते थे, क्योंकि उनको भी चारा देना पड़ता था, जैसे :  आजकल वाहनों में पेट्रोल और डीजल देना पड़ता है। 
किन्तु, निर्धनता अधिक होने के कारण वो उनके चारे की भी व्यवस्था नहीं कर पाते थे। 

दोस्तों उस समय जिसके पास घोड़ा या बैलगाड़ी होती थी, उसकी गणना धनवानों में की जाती थी, और उसकी ख्याति आस - पास के कई गाँवों तक फैल जाती थी। उस समय यात्रा करना आज जितना आसान नहीं था। आजकल अगर कहीं जाना हो, तो बस बाइक उठाई और भर्र,,र,,र ,,र,, से निकल लिए, अगर लंबी दूरी की यात्रा करनी है, तो बस या ट्रेन से चल दिए।

एक देश से दूसरे देश के लिए हवाई जहाज का प्रयोग कर लिया। यातायात के इन उन्नतशील साधनों ने सभी के जीवन को, और आवागमन को सुगम बना दिया है।
लेकिन अब, जब लोगों के पास यातायात के इतने साधन हैं, जो कि समय और श्रम दोनों की बचत करते हैं, तो अब लोगो के पास पर्याप्त समय ही नही है।

लोग इन साधनों का गलत तरीके से इस्तेमाल करते हैं। और वे यह भी भूल जाते हैं कि, कोई भी साधन जितना सुविधाजनक होता है, उतना ही हानिकारक भी होता है।


जाम

आजकल जनसंख्या वृद्धि और साधनों की सहज उपलब्धता के कारण सड़को पर ट्रैफिक जाम बहुत बढ़ गया है, जो न कि, सिर्फ प्रदूषण का कारण है बल्कि तरह तरह की बीमारियों जैसे : अस्थमा, सांस लेने में तकलीफ, एलर्जी, आदि का भी ज़िम्मेदार है।

सभी लोगों को अपने गंतव्य तक पहुँचने की बहुत जल्दी होती है, जिसके कारण वे यातायात के नियमों का उल्लंघन करने से भी पीछे नहीं हटते।

और तो और हमारी सेवा में जो ट्रैफिक पुलिस वाले खड़े रहते है, उनकी भी, परवाह किये बिना उनको गाली देते हुए ऐसे निकल जाते हैं, जैसे वो हमें गंतव्य तक जाने से रोक रहें हो।

लोगों की वाहन चलाते समय इतनी शीघ्रता देख कर, बचपन में पढ़ाई गयी, मुझे अंग्रेजी की एक कहावत याद आती है :- "Haste Makes Waste".  लेकिन शायद अब लोग इसे भूलते जा रहे हैं।

आजकल लोग अपना कीमती समय कहीं और बेकार की बाते करके या फालतू घूमकर व्यर्थ ही क्यूँ न गवां दे, लेकिन सड़क पर सबको बड़ी जल्दी रहती है, सभी को एक दूसरे से आगे निकलना रहता है।

और तो और जल्दी की इंतहा तो तब हो जाती है, जब एक साईकल वाला दूसरे साईकल वाले से टकरा जाता है और फिर दोनों एक दूसरे को कहते हैं : "अंधे हो का बे। दिखाई नहीं देता है।"
और इसी शीघ्रता में वो खुद को भी हानि पहुँचाते हैं,  और दूसरों को भी।

कभी कोई बाएं से कट मारता है, तो कोई दाएं से, कोई बीच सड़क पे अचानक गाड़ी रोक देता है, कोई बिना इंडीकेटर दिए गाड़ी मोड़ लेता है, बैटरी चलित रिक्शे वाले भी ऐसे रिक्शा चलाते हैं, जैसे प्लेन उड़ा रहे हो। 

यहाँ तक कि पैदल चलने वाले लोग भी वाहनों के रुकने का इंतज़ार नहीं करते, और बिना इंतज़ार किये ही सड़क पार करने लगते हैं।

नौजवान युवक और युवतियां हेलमेट लगाना पसंद नहीं करते, बल्कि हेड फ़ोन लगाकर गाना सुनते हुए, और मोबाइल फ़ोन पर बातें करते हुए  वाहन चलाना ज्यादा पसंद करते हैं ।



लोग ट्रैफिक नियमों को अनदेखा कर अपनी मर्ज़ी से, अपने नियमों से गाड़ी चलाते हैं, जिसके परिणाम स्वरूप रोज़ ही हम लोग अपनी आंखों के सामने विभिन्न प्रकार से दुर्घनाएं घटित होते देखते हैं, और रोज़ ही अखबार में एक दो पेज दुर्घटनाओं की दुखद दास्तां बयाँ करते हैं।

अगर हम लोग खुद ही, इस प्रकार यातायात नियमों का उल्लंघन करेंगे, तो हम अपनी आने वाली पीढ़ी को क्या सिखाएंगे ??

इसलिए हम सभी लोगों को यातायात नियमों का पालन करना चाहिए,तथा दूसरों को भी इसके लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। हमेशा हेलमेट पहनकर और सीटबेल्ट बांधकर ही वाहन चलाना चाहिए । वाहन चलाते समय न तो फ़ोन पर बात करनी चाहिये, और न ही गाने सुनने चाहिए।
वाहनों की गति को नियंत्रण में रखकर 40 से 50 की स्पीड पर ही चलाना चाहिए।
और जितना हो सके वाहनों का प्रयोग कम से कम करना चाहिए। इस से पेट्रोल और प्रदूषण दोनों में कमी आएगी।  छोटी दूरी की यात्रा पैदल या फिर साईकल से ही करनी चाहिए।

आपकी यात्रा मंगलमय हो ।

आइये हम सब मिलकर परिवर्तन की शुरुवात आज से ही करें ताकि हम अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए एक अच्छे भविष्य का निर्माण कर सके ।

कमेंट के माध्यम से अपने प्यार भरे विचारों और सुझावों से मुझे अवश्य अवगत कराएं ।
आपके विचारों की प्रतीक्षा में ........


Sunday, October 29, 2017

प्यार : कल आज और कल


दोस्तो प्यार से तो आप सभी लोग भली-भाँति परिचित ही होंगें। प्यार एक अहसास है, जो सभी लोगों को उनके जीवन में एक न एक बार अवश्य होता है, और कई लोगों को तो कई कई बार हो जाता है। प्यार कई प्रकार का होता है, जैसे: माता-पिता का प्यार, भाई-बहन का प्यार,पति-पत्नी का प्यार और प्रेमी प्रेमिका का प्यार। दोस्तो इनमे से जो सबसे ज्यादा रोमांचक होता है, वो है प्रेमी प्रेमिका का प्यार।

आज हम प्रेमी प्रेमिका के प्यार पर बात करेंगे।
दोस्तो पहले प्रेमी प्रेमिका वाले प्यार को अपराध माना जाता था, और प्यार करने वालों को अपराधी। अगर समाज में लोगों को प्यार करने वालों के बारे में पता चल जाता था, तो वो लोग प्रेमी जोड़े को तरह तरह से प्रताड़ित करने लगते थे। या तो लड़की की जबरन शादी कर दी जाती थी या फिर दोनों को मार दिया जाता था। ऐसे कुछ अमर प्रेमी जोड़ों के नाम आपने अवश्य सुने होंगे जैसे : लैला मजनूं और हीर रांझा।

लेकिन फिर भी लोग छुप छुप के प्यार करते थे। दोस्तो पहले एक और बहुत बड़ी समस्या होती थी और वो होती थी प्यार का इज़हार। प्यार तो हो गया लेकिन अब इज़हार कैसे हो। लोगो को प्यार का इज़हार करने में महीनों और सालों का समय लग जाता था। जब तक इज़हार नहीं होता था, तब तक बस दूर दूर से ही एक दूसरे को देखकर काम चलाना पड़ता था। और एक दिन वो हसीन पल आ ही जाता था जिस दिन किसी चिट्ठी के माध्यम से या किसी दोस्त या सहेली के माध्यम से प्रेम का इज़हार हो जाता था, और फिर शुरू होता था, चिट्ठियों का सिलसिला। और दोस्तों सबसे मज़े की बात, जो हमारा लोकल डाकिया हुआ करता था, मोहल्ले का छोटू , थोड़े से कम्पट, टॉफी और पैसो की छोटी सी तनख्वाह में चिट्ठियों का आदान प्रदान पूरी मेहनत और लगन के साथ किया करता था।

और कभी कभी चोरी छिपे किसी बहाने से, किसी शादी या गाँव के मेले में प्रेमी जोड़े का मिलन भी हो जाता था। कई बार तो प्रेमी प्रेमिका से मिलने के लिए रात के अंधेरे में 15 से 20 किलोमीटर तक साइकिल चलाकर उससे मिलने उसके गांव पहुँच जाता था, कभी कभी तो मुलाकात हो जाती थी और कभी कभी बस देखकर ही वापस लौटना पड़ता था। प्रेमी जोड़े आपस में आंखों से ही बाते कर लिया करते थे,ताकि किसी और को पता न चल सके.

लेकिन इस प्यार की उम्र तभी तक होती थी, जब तक किसी को पता न चले, जैसे ही किसी को पता चला या ज़रा सा शक भी हुआ तो समझो प्यार समाप्त। लेकिन कुछ लोग उस ज़माने में भी, प्यार को समझते थे और प्यार का सम्मान करते थे, उस ज़माने में भी इक्का दुक्का प्रेम विवाह हो जाता था, लेकिन उसके लिए भी बड़े बड़े पापड़ बेलने पड़ते थे । लेकिन आज कल सब कुछ बड़ा जल्दी जल्दी होने लगा है।
आजकल प्यार भी बहुत जल्दी हो जाता है, और प्यार का इज़हार भी, और जितनी तेजी से ये सब होता है, उतनी तेज़ी से ही सब टूट भी जाता है। प्यार को नए नए शब्दो से संबोधित किया जाता है, प्यार में पड़ने को patch up और अलग हो जाने को break up कहा जाता है।

आजकल जितनी जल्दी patch up होता है break up उससे भी तेजी से हो जाता है। स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को भी प्यार हो जाता है। अपने पसंद की लड़की को देखकर, अपने दोस्तों से कहते है- वो देख तेरी भाभी आ गयी। फिर दूसरा दोस्त बोलेगा - लाल ड्रेस वाली मेरी हरी वाली तेरी । यहां तक कि आपस में एक दूसरे को blackmail करते हैं- सीधे बैठ वरना भाभी को बता दूंगा । अगर एक दिन लड़की कॉलेज नही आई तो सारे दोस्त बोलेंगे- आज भाई का मन नही लग रहा क्योंकि भाभी नही आई है। और फिर सारे, अपने दोस्त के लिए भाभी की खबर लाने चल देते हैं।

ईमानदारी इतनी की आपस में तय करने के बाद सिर्फ अपनी अपनी वाली को ही देखते हैं। अगर किसी और ने देख लिया तो उसकी तो शामत आयी समझो। अगर बात बन गयी तो ठीक वरना class change और भाभी change ।
आजकल प्रेमी जोड़े को बात करने के लिए किसी छोटू की जरूरत नहीं पड़ती। बल्कि आजकल बाबा जियो और मोबाइल फ़ोन्स प्रेमी जोड़ों के भगवान हैं। जिन्होंने प्रेमी जोड़ों को बात करने की पूरी आजादी दे रखी है। प्रेमी जोड़े एक दूसरे के पल पल की खबर रखते हैं- खाना खाया या नहीं, पानी पिया या नहीं, कहाँ हो, क्या कर रहे हो क्या नहीं। और तो और आजकल video call से एक दूसरे को देख कर  भी बाते कर लेते हैं।
और पर्यावरण संरक्षण हेतु सरकार ने तरह तरह के पार्को का निर्माण कराकर बैठने के लिए जगह भी दे दी है।
तो पहले की अपेक्षा आजकल प्रेमी जोड़ों के लिए  ज्यादा सुविधाएं हैं। बस अंतर है तो केवल इतना कि, पहले प्रेम भावनात्मक और आत्मीय होता था परंतु आजकल शारीरिक और आडम्बर से परिपूर्ण होता है।

दरअसल आजकल लोग प्यार को समझ ही नहीं पाते बल्कि वो आकर्षण को ही प्यार समझ लेते हैं। हम इंसानो के लिए एक दूसरे के प्रति आकर्षित होना स्वाभाविक है, लेकिन आकर्षण को ही प्रेम समझ लेना हमारी भूल है।
कहीं जाते हुए, कहीं से आते हुए या आपके कार्यस्थल पर कोई लड़की अच्छी लग जाती है, मन को भा जाती है, तो ये प्यार नहीं बल्कि ये आकर्षण है, और दोस्तो आकर्षण कई बार हो सकता है, रोज़ भी हो सकता है। लेकिन प्यार रोज़ नहीं हो सकता। प्यार सिर्फ अच्छी और खूबसूरत शक्ल देखकर नहीं होता, बल्कि प्यार तब शुरू होता है, जब आप एक दूसरे को समझना शुरू करते हैं। जब एक दूसरे की अच्छाइयां और बुराइयां समझ में आने लगती हैं, जब हम किसी को उसकी वास्तविकता के साथ स्वीकार कर लेते हैं, तो वो होता है प्यार।

आजकल लोग समझते है की जिससे प्यार करो उसको किसी भी कीमत पर हासिल कर लो चाहे उससे किसी का बुरा ही क्यों न हो जाये । अपने प्यार को पाने के लिए अपने साथी को ही दुख पहुँचा देते हैं। अगर तुम मेरी नहीं हो सकती तो किसी की नहीं हो सकती, इस तरह की दूषित  सोच रखते हैं, तो दोस्तो ये प्यार नहीं। ये सब फिल्मी बातें है जो मनोरंजन के लिए ही ठीक हैं। प्यार हमें पाने की ज़िद, हासिल करने का जुनून, एकाधिकार, बदले की भावना, ये सब नहीं सिखाता बल्कि, प्यार में एक दूसरे की खुशी, एक दूसरे का सम्मान, आत्मसमर्पण ये ज्यादा जरूरी होता है, जो कि हमें भगवान श्री कृष्ण और राधा के प्यार से सीखने को मिलता है जिन्होंने प्यार तो किया लेकिन साथ में नहीं रह सके। राधा जी हमेशा मन से श्री कृष्ण की ही रहीं, उन्होंने खुद को श्रीकृष्ण के लिए समर्पित कर दिया। श्रीकृष्ण अगर चाहते तो राधा जी को हासिल कर सकते थे, उनके लिए ये बहुत ही आसान होता, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योंकि ये प्रेम की मर्यादा का उल्लंघन होता।
दोस्तों प्रेम ईश्वर द्वारा मनुष्य को दिया गया अनमोल उपहार है। हमें इस उपहार का सही प्रयोग करना चाहिए।
आने वाली पीढ़ी को हमें प्रेम के प्रति शिक्षित करना चाहिए उन्हें प्रेम और आकर्षण में अंतर समझाना चाहिए, ताकि हम एक ऐसे समाज का निर्माण कर सके जहाँ हर तरफ केवल प्रेम ही प्रेम हो ।

Love is a Noble Virtue of Human Heart...(Rudra Tiwari)
दोस्तों आपको मेरे विचार कैसे लगे कमेंट बॉक्स में कमेंट करके मुझे अवश्य अवगत कराएं आपके विचारो की प्रतीक्षा में----

Sunday, October 22, 2017

रिश्ते कल आज और कल



दोस्तों रिश्ते हमारे भारतीय समाज का एक मजबूत आधार हैं। हमारे समाज में रिश्तों को कई नामो से जाना जाता है जिनमें भाई-बहन,पति-पत्नी,पिता-पुत्र,माता-पुत्र,सास-ससुर आदि प्रमुख हैं। इनमें से माता-पुत्र का रिश्ता एक ऐसा रिश्ता है जो इस समाज को एक अटूट बंधन में बाँधे हुए है। माता अपने पुत्र की भलाई के लिए निःस्वार्थ होकर समाज के विरुद्ध भी खड़ी हो जाती है। सही मायने में रिश्ते वही होते हैं जो निःस्वार्थ भाव से निभाये जाते हैं। समाज में जो लोग इन रिश्तो को निभाते हैं उन्हें रिश्तेदार कहा जाता है।
दोस्तो पहले रिश्तेदार निःस्वार्थ भाव से एक दूसरे के साथ रिश्तों को निभाया करते थे।
सुख में दुःख में किसी भी आपातकाल परिस्तिथि में रिश्तेदार आगे आकर एक दूसरे का सहयोग किया करते थे।
किसी के घर सुख में पहुँच सको या न पहुँच सको लेकिन दुःख में पहुँचना लोगो के लिए प्राथमिकता हुआ करती थी। पहले लोग अगर किसी भी कार्यक्रम के लिए रिश्तेदारों को निमंत्रण देते थे तो रिश्तेदार कार्यक्रम के प्रारंभ होने के एक हफ्ते पहले पहुँच जाते थे और कार्यक्रम के सम्पूर्ण होने के एक हफ्ते बाद तक रुके रहते थे और इस दौरान उस घर को अपना घर समझकर कार्यक्रम संबंधी सभी कार्य तल्लीनता से किया करते थे ताकि कार्यक्रम को अच्छे तरीके से सम्पन कराया जा सके। और अगर कोई रिश्तेदार किसी भी बीमारी या अन्य किसी कारणवश कार्यक्रम में शामिल नहीं हो पाता था तो बाकी लोग कार्यक्रम के सम्पन होने के बाद उसकी सलामती की खबर लेने उसके घर पहुँच जाते थे। किन्तु आज के इस बदलते परिवेश में रिश्तेदारों ने रिश्तो के मायने बदल दिए हैं। आज लोग केवल अपनी उपस्तिथि दर्ज कराने के लिए किसी कार्यक्रम में जाते हैं और वहाँ मौजूद स्वादिष्ट पकवानों का आनंद लेते है और जो पकवान या व्यवस्था उन्हें पसंद नही आती उसकी आलोचना करने में भी पीछे नही रहते। खुद तो आलोचना करते ही हैं और साथ में बाकी लोगो को भी विभिन्न प्रकार की कमियों से अवगत कराते हैं।
कुछ लोग तो इस कदर बड़बोले होते हैं कि वे अपनी ही प्रसंशा में लगे रहते हैं कि मेरे पास तो ये है, मेरे पास तो वो हैं मैने अपनी बेटी की शादी में ये किया था, मुझे मेरे बेटे की शादी में वो मिला था, चाहे उनसे कोई ये सब पूछे या न पूछे पर वो बिना किसी के पूछे ही सब बताते रहते हैं। और चार लोग वहीं खड़े होकर उनकी हाँ में हाँ मिलाते रहते हैं। और दोस्तो मज़ा तो तब आता है जब कोई एक उनकी हाँ में हाँ न मिलाकर बल्कि उनकी बात को मानने से इनकार कर देता है तो तुरंत उसके जाने पर बाकी लोगों से उसकी भी बुराई करने में पीछे नही हटते। आपके मुंह पर आपकी भलाई और पीठ पीछे आपकी बुराई करते रहते हैं।


इस पर कुछ लोगो का ये भी मत हो सकता है कि आजकल भाग दौड़ भरी ज़िन्दगी में किसी के पास इतना समय नहीं है कि एक हफ्ते किसी कार्यक्रम में शामिल हुआ जा सके। इस पर मेरा विचार यह है कि यह आवश्यक नही की हम किसी कार्यक्रम में अपना नुकसान करके शामिल हो परंतु आवश्यक यह है कि हम निःस्वार्थ भाव से शामिल हो किसी की मदद करके उसका सम्मान बढ़ाने की सोच के साथ शामिल हो, जिस काबिल हम हैं जो कार्य हम कर सकते हैं वो कार्य करने के उद्देश्य से शामिल हो। किसी प्रकार की लालच या किसी को नीचा दिखाने के उद्देश्य से किसी कार्यक्रम में शामिल होना महानता नहीं। अगर हम किसी की प्रसंशा नहीं कर सकते तो हमें किसी की बुराई भी नहीं करनी चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति का अपना सम्मान होता है और वह उसे पाने का अधिकारी भी हैं।

कुछ लोग अगर यह समझते हैं कि वो दूसरो को नीचा दिखाकर या दूसरों का अपमान करके बहुत अच्छा करते हैं और समाज में अपना मान बढ़ाते हैं तो माफ कीजिये वो लोग बिल्कुल गलत समझते हैं। जो मान हम किसी का सम्मान करके प्राप्त कर सकते हैं वो किसी का अपमान करके कभी भी प्राप्त नहीं कर सकते। आजकल लोग दिखावा करना ज्यादा पसंद करते हैं, और लोग दिखावे की तरफ आकर्षित भी होते हैं।लोग दौलत के लिए रोज़ नए-नए रिश्ते बनाते है, पर वो रिश्ते जो दौलत की लालच में बनाये जाते हैं वो दौलत के साथ ही समाप्त भी हो जाते हैं।
हमे अपने आने वाली पीढ़ी को रिश्तो और रिश्तेदारों के प्रति जागरूक करना चाहिए उन्हें यह अवश्य सिखाना चाहिए कि सही मायने में रिश्ते कैसे निभाये जाते हैं। रिश्तों को कभी भी दौलत से नहीं मापना चाहिए कोई भी रिश्तेदार अमीर या गरीब नहीं होता। हमें सभी रिश्तेदारों का समान रूप से सम्मान करना चाहिए। हमें अपने से छोटे भाई-बहनों का भी उतना ही सम्मान करना चाहिए जितना कि हम अपने से बड़े भाई-बहनों का करते हैं।
जो रिश्ते प्रेम, विश्वास और निस्वार्थ भाव के साथ बनाये जाते हैं वो अटूट होते हैं।
हमें अपने बीते हुए कल से सीख लेकर आने वाले कल को सवारनें के लिए आज से ही अपने बच्चों और भाई-बहनों को रिश्तों के प्रति जागरूक करना चाहिए।
उन्हें उन रिश्तेदारों के प्रति भी जागरूक करना चाहिए जो दूसरों का अपमान करने में ही अपना सम्मान समझते हैं जिनको आपका अहित करने में ही प्रसन्नता होती है उन रिश्तों को तोड़ देने में ही भलाई है।
रिश्ते वही सच्चे जो सुख दुख में आपके साथ बने रहें।
दोस्तो आपको मेरे विचार कैसे लगे नीचे कमेंट बॉक्स में कमेंट करके अवश्य अवगत कराएं।
आपके प्यार भरे विचारो की प्रतीक्षा में।

Thursday, October 19, 2017

दीपावली : कल आज और कल


मित्रो आज दीपावली का पर्व है तो सबसे पहले आप सभी लोगों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं ।

जैसा कि आप सभी लोग जानते ही हैं कि दीपावली खुशियों का एक पर्व है क्योंकि इस दिन प्रभु श्री राम चौदह वर्ष का वनवास पूरा करके अपनी पत्नी माँ सीता व भ्राता श्री लक्ष्मण के साथ अयोध्या वापस आये थे तो इस दिन पूरे अयोध्या वासियो ने उनके आगमन की खुशी में घी व तेल के दीप जलाकर उनका स्वागत किया था ।
दीपावली का अर्थ ही है दीपों का त्योहार। दीपावली के पहले ही लोग अपने घरों में साफ सफाई कर लेते है और दीपावली के दिन विशेष प्रकार के भोजन और मिठाइयां बनाते हैं। दीपावली की शाम को सभी लोग माँ लक्ष्मी और विघ्नहर्ता श्री गणेश की पूजा करते है घरो को रंगोली और विभिन्न प्रकार की रंग बिरंगी झालरों और दीपो से सजाते हैं और बच्चे और बड़े मिलकर पटाखे भी फोड़ते हैं।
लेकिन मित्रो क्या आपको ये पता है कि पहले लोग पटाखे क्यो फोड़ते थे ?
पहले लोगो के पास आज की तरह मोबाइल फ़ोन नही हुआ करते थे तो लोग पटाखे फोड़ के संदेश देने का काम किया करते थे। जहाँ तक पटाखे की आवाज जाती थी वहाँ तक लोगो को पता चल जाता था कि अवश्य ही कहीं पर कोई खुशी की बात है।
किन्तु आज लोगो को इस बात का कोई आभास ही नही है कि आज वे पटाखे का प्रयोग संदेश देने के लिए नही अपितु, पर्यावरण को जाने अनजाने हानि पहुँचाने के लिए कर रहे हैं और कई बार इन्ही पटाखों से हम लोग स्वयं को भी हानि पहुँचा लेते हैं। इसलिए हमें कोशिश करनी चाहिए कि जहाँ तक हो सके पटाखों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
पहले सभी संबंधी और रिश्तेदार इन्ही पर्वो को एकसाथ मिलकर मनाते थे सभी साथ मे बैठकर खाना खाते थे और पूरा दिन साथ मे व्यतीत करते थे। लेकिन आजकल जीवन इतना ज्यादा व्यस्त हो चुका है कि किसी भी पर्व पर पूरा परिवार एकत्रित नही हो पाता सभी लोग बस फेसबुक और व्हाट्सएप्प पर एक दूसरे को बधाई दे देते है आजकल बच्चे सिर्फ पटाखे फोड़ने को ही दीपावली समझते हैं।
अगर इसी प्रकार हम लोग अपने जीवन मे व्यस्त होते गए तो कुछ ही समय बाद सारे पर्व और उनके महत्व विलीन हो जाएंगे ।
इसलिए हमें सारे पर्व खुद भी धूम धाम से मनाने चाहिए और बच्चो को भी उनके महत्व के बारे में बताना चाहिए क्योकि हर पर्व का अपना एक अलग महत्व है और हर पर्व अपने साथ ढ़ेर सारी खुशियां लेकर आता है।
आप सभी को एक बार फिर दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।