कल आज और कल

कल आज और कल

Saturday, November 25, 2017

चिकित्सक : कल आज और कल



दोस्तों चिकित्सक या डॉक्टर एक ऐसा व्यक्ति होता है, जो अपने ज्ञान और अनुभव के आधार पर हमारे अस्वस्थ हो जाने पर विभिन्न प्रकार की औषधियों के माध्यम से एक निर्धारित शुल्क लेकर हमें स्वस्थ कर देता है। चिकित्सक द्वारा इस प्रकार किये गए उपचार को चिकित्सा कहा जाता है।
हमारे समाज में चिकित्सक को भगवान का दर्जा दिया जाता है। और उपयुक्त सम्मान किया जाता है |
जब भी हम लोगों को खांसी, बुखार, वायरल या अन्य किसी प्रकार के रोग हो जाते है, तो हम लोग बिना देरी किये तत्काल चिकित्सक के पास जाकर अपना इलाज कराते हैं।

क्या आपको पता है कि, पहले जब चिकित्सा के  क्षेत्र में इतना विकास नहीं हुआ था, तो लोग उपचार कैसे कराते थे ?

पहले लोगों का उपचार आयुर्वेदिक पद्धति से वैद्य जी द्वारा किया जाता था। तीन चार गावों में एक ही वैद्य जी हुआ करते थे, जो गाँव के लोगो का उपचार किया करते थे। लेकिन वैद्य जी भी केवल छोटी मोटी बीमारियों का ही उपचार कर पाते थे, और गंभीर बीमारियों की दशा में रोगी की मृत्यु भी हो जाती थी। कुछ वैद्य सभी प्रकार के रोगों का इलाज़ करने में सक्षम थे, लेकिन उनकी संख्या बहुत कम होती थी, पहले  बाह्य उपचार अधिक प्रचलन में था, क्योंकि शल्य चिकित्सा में असहनीय दर्द होता था, और इसका विकास तथा अनुसंधान प्रारंभिक दौर से गुज़र रहा था।


ऐसा नहीं है, कि जड़ी बूटियां फायदेमंद नहीं होती थी, किन्तु हाँ, असर होने में समय अवश्य लगता था, और तब तक देर हो जाती थी। आजकल विज्ञान की सहायता से चिकित्सा के क्षेत्र में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है।
आज विभिन्न प्रकार की जाँचो के माध्यम से रोगी के रोगों का पहले ही पता लगा लिया जाता है, और  समय पर उपचार देकर उसे पूर्णतः स्वस्थ भी कर दिया जाता है।
किन्तु गाँवो में चिकित्सा की व्यवस्था आज भी अत्यंत दयनीय है।
गाँवो में न तो अच्छे चिकित्सालय है, और न ही अच्छे चिकित्सक।
मुझे आज भी अच्छे से याद है, कि जब मैं और मेरा भाई छोटे थे, तो हमारा पूरा परिवार गाँव में ही निवास करता था। और सर्दियों की गलन भरी रातों में जब हम अचानक बीमार पड़ जाते थे, तो मेरी माँ, मेरे चाचा जी के साथ साईकल के पीछे कैरियर पर मुझे लेकर बैठ जाती थी, और मेरे चाचा जी रात में ही घर से 25 - 30 किलोमीटर दूर चिकित्सक के पास जाकर मेरा उपचार कराते थे।
गाँव में या उसके आस पास किसी भी चिकित्सक के न होने के कारण उनको इतनी दूर भूखे-प्यासे कड़ाके की ठंड में साईकल चलाकर जाना पड़ता था। कभी उनके पास चिकित्सक को देने के लिए पैसे होते थे और कभी नहीं।
किन्तु फिर भी चिकित्सक महोदय उपचार कर दिया करते थे, और कहते थे, बाद में जब हो जाये तब आ कर दे जाना या फिर जब अगली बार आना तब दे देना।
किन्तु आजकल की परिस्थियां बिल्कुल भिन्न हैं आज गाँवो में चिकित्सक तो हैं लेकिन गुमराह करने वाले और पैसे ऐठने वाले ।
कुछ लोग जो शहर में किसी अच्छे चिकित्सक के यहाँ कम्पाउण्डर होते है, वो गाँव में जाकर चिकित्सक बन जाते हैं और भोले भाले लोगों के जीवन के साथ खिलवाड़ करते हैं।


पैसा कमाने के लिए कुछ लोग शहरों में आकर किसी पैथोलॉजी में कुछ दिन काम करके, एक दो चीज़े सीख लेते हैं, और गाँव में जाकर खुद की पैथोलॉजी खोल लेते हैं, और खुद चिकित्सक बन जाते हैं।
वो झोलाछाप चिकित्सक, मरीजों को उन्ही झोलाछाप पैथोलॉजी वालो के यहां जांच कराने को बोलते हैं। 
भोला भाला मरीज ठीक होने के लिए जांच कराता है और फिर वो पैथोलॉजी वाले उन्हें जांच की रिपोर्ट भी देते हैं। लेकिन उस रिपोर्ट पर न तो चिकित्सक का नाम होता है, न ही हस्ताक्षर और न ही मुहर ।
और इसी फ़र्ज़ी जाँच के आधार पर वो झोलाछाप चिकित्सक मरीज का उपचार करना प्रारंभ भी कर देते हैं। और पैसे ऐंठने के बाद  जब मरीज़ को फ़ायदा नहीं होता है तो उसे दूसरे चिकित्सक के पास जाने की सलाह देते हैं।
सरकारी चिकित्सालय के चिकित्सक अच्छे व अनुभव से परिपूर्ण होते हैं किंतु वहाँ पर भीड़ इतनी होती है कि आपको दिखाने में दो दिन तो लग ही जायेंगे।
और प्राइवेट चिकित्सालयों में महँगाई इतनी होती है कि सभी वर्गों के लिए प्राइवेट चिकित्सालयों में इलाज कराना संभव नही है। भिन्न भिन्न प्राइवेट चिकित्सालयों में एक ही बीमारी और एक ही जांच के मूल्यों में अंतर पाया जाता है। 
इस बात में कोई संदेह नहीं कि चिकित्सक बनने के लिए कठोर परिश्रम करना पड़ता है, और कॉलेज और कोचिंग की फीस में पर्याप्त धन भी खर्च हो जाता है। किंतु चिकित्सक बनने के बाद सारा धन तत्काल वापस पाने की चाह में इलाज महंगा कर देना अच्छी बात नहीं। चिकित्सक के मन में चिकित्सा के समय धन पाने की चाह के साथ सेवा भाव का होना भी आवश्यक है।


दोस्तों सेहत हमारी है, इसलिए सजग भी हमें ही रहना होगा।
एक बहुत पुरानी कहावत भी है : जान है तो जहान है।
हमें अच्छे और अनुभवी चिकित्सक के पास ही उपचार कराना चाहिए, और रोग के बारे में चिकित्सक से आवश्यक जानकारी भी प्राप्त करनी चाहिए।
जिस प्रकार हम अन्य योजनाओं के लिए पैसे बचाते हैं, उसी प्रकार हमे बीमारियों के लिए भी अलग से बचत या निवेश करना चाहिए।
सरकार को भी चिकित्सा क्षेत्र के लिए ऐसे कानून बनाने चाहिए, जिससे इस प्रकार के झोलाछाप चिकित्सको पर लगाम लगे, और प्राइवेट चिकित्सालयों की मनमानी रुके।
चिकित्सा प्रत्येक जीव का  मूलभूत अधिकार है चाहे वह मनुष्य हो या पशु |
जिस दिन अधिकतर लोग  स्वस्थ होंगे, तभी एक अच्छे समाज और विकसित राष्ट्र का निर्माण हो सकता है।

                      स्वस्थ रहें । मस्त रहें ।।

दोस्तो आप लोग भी चिकित्सक और चिकित्सा पर अपने विचारों से मुझे अवश्य अवगत कराएं। 
आपके विचारों की प्रतीक्षा में ।।

Saturday, November 18, 2017

यातायात : कल आज और कल


दोस्तों, जैसा कि आप सभी लोग जानते हैं, कि यातायात के माध्यम से हम लोग एक जगह से दूसरी जगह आसानी से यात्रा कर सकते हैं। 
आज हमारे पास यातायात के अनेक साधन उपलब्ध हैं, जैसे :- साईकल, मोटर साइकिल, कार, बस, ट्रेन, हवाई जहाज, ऑटो, टैक्सी आदि जिनकी सहायता से हम लोग एक स्थान से दूसरे स्थान तक आसानी से आ और जा सकते हैं।

लेकिन दोस्तों ज़रा सोचिए, "अगर आपके पास यातायात के लिए इनमें से कोई भी साधन उपलब्ध न हो "!

यह सोचकर ही, ऐसा लगता है, की "ज़िंदगी मानो एक ही स्थान पर ठहर सी गयी हो।"

दोस्तों पहले, जब यातायात के इन साधनों का अविष्कार भी नहीं हुआ था, तब लोग पैदल ही आवागमन किया करते थे। एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने में उन्हें कई-कई दिन और रात लग जाते थे। दिन भर वो लोग चलते थे, और रात में रास्ते में ही कहीं, उचित स्थान देखकर रुक जाते थे, और रास्ते के लिए जो सत्तू , चना या चबैना घर से बांधकर लेकर चलते थे, उसको खाकर रात में विश्राम कर लिया करते थे, और सुबह उठकर  फिर यात्रा प्रारंभ कर दिया करते थे ।

बैल गाडी

कई लोग घोड़े, हाथी, ऊँट और बैलगाड़ी आदि का भी प्रयोग यातायात के लिए करते थे।  किन्तु अधिकतर लोग बैल, घोड़े और हाथी जैसे पालतू जानवर भी नहीं रख पाते थे, क्योंकि उनको भी चारा देना पड़ता था, जैसे :  आजकल वाहनों में पेट्रोल और डीजल देना पड़ता है। 
किन्तु, निर्धनता अधिक होने के कारण वो उनके चारे की भी व्यवस्था नहीं कर पाते थे। 

दोस्तों उस समय जिसके पास घोड़ा या बैलगाड़ी होती थी, उसकी गणना धनवानों में की जाती थी, और उसकी ख्याति आस - पास के कई गाँवों तक फैल जाती थी। उस समय यात्रा करना आज जितना आसान नहीं था। आजकल अगर कहीं जाना हो, तो बस बाइक उठाई और भर्र,,र,,र ,,र,, से निकल लिए, अगर लंबी दूरी की यात्रा करनी है, तो बस या ट्रेन से चल दिए।

एक देश से दूसरे देश के लिए हवाई जहाज का प्रयोग कर लिया। यातायात के इन उन्नतशील साधनों ने सभी के जीवन को, और आवागमन को सुगम बना दिया है।
लेकिन अब, जब लोगों के पास यातायात के इतने साधन हैं, जो कि समय और श्रम दोनों की बचत करते हैं, तो अब लोगो के पास पर्याप्त समय ही नही है।

लोग इन साधनों का गलत तरीके से इस्तेमाल करते हैं। और वे यह भी भूल जाते हैं कि, कोई भी साधन जितना सुविधाजनक होता है, उतना ही हानिकारक भी होता है।


जाम

आजकल जनसंख्या वृद्धि और साधनों की सहज उपलब्धता के कारण सड़को पर ट्रैफिक जाम बहुत बढ़ गया है, जो न कि, सिर्फ प्रदूषण का कारण है बल्कि तरह तरह की बीमारियों जैसे : अस्थमा, सांस लेने में तकलीफ, एलर्जी, आदि का भी ज़िम्मेदार है।

सभी लोगों को अपने गंतव्य तक पहुँचने की बहुत जल्दी होती है, जिसके कारण वे यातायात के नियमों का उल्लंघन करने से भी पीछे नहीं हटते।

और तो और हमारी सेवा में जो ट्रैफिक पुलिस वाले खड़े रहते है, उनकी भी, परवाह किये बिना उनको गाली देते हुए ऐसे निकल जाते हैं, जैसे वो हमें गंतव्य तक जाने से रोक रहें हो।

लोगों की वाहन चलाते समय इतनी शीघ्रता देख कर, बचपन में पढ़ाई गयी, मुझे अंग्रेजी की एक कहावत याद आती है :- "Haste Makes Waste".  लेकिन शायद अब लोग इसे भूलते जा रहे हैं।

आजकल लोग अपना कीमती समय कहीं और बेकार की बाते करके या फालतू घूमकर व्यर्थ ही क्यूँ न गवां दे, लेकिन सड़क पर सबको बड़ी जल्दी रहती है, सभी को एक दूसरे से आगे निकलना रहता है।

और तो और जल्दी की इंतहा तो तब हो जाती है, जब एक साईकल वाला दूसरे साईकल वाले से टकरा जाता है और फिर दोनों एक दूसरे को कहते हैं : "अंधे हो का बे। दिखाई नहीं देता है।"
और इसी शीघ्रता में वो खुद को भी हानि पहुँचाते हैं,  और दूसरों को भी।

कभी कोई बाएं से कट मारता है, तो कोई दाएं से, कोई बीच सड़क पे अचानक गाड़ी रोक देता है, कोई बिना इंडीकेटर दिए गाड़ी मोड़ लेता है, बैटरी चलित रिक्शे वाले भी ऐसे रिक्शा चलाते हैं, जैसे प्लेन उड़ा रहे हो। 

यहाँ तक कि पैदल चलने वाले लोग भी वाहनों के रुकने का इंतज़ार नहीं करते, और बिना इंतज़ार किये ही सड़क पार करने लगते हैं।

नौजवान युवक और युवतियां हेलमेट लगाना पसंद नहीं करते, बल्कि हेड फ़ोन लगाकर गाना सुनते हुए, और मोबाइल फ़ोन पर बातें करते हुए  वाहन चलाना ज्यादा पसंद करते हैं ।



लोग ट्रैफिक नियमों को अनदेखा कर अपनी मर्ज़ी से, अपने नियमों से गाड़ी चलाते हैं, जिसके परिणाम स्वरूप रोज़ ही हम लोग अपनी आंखों के सामने विभिन्न प्रकार से दुर्घनाएं घटित होते देखते हैं, और रोज़ ही अखबार में एक दो पेज दुर्घटनाओं की दुखद दास्तां बयाँ करते हैं।

अगर हम लोग खुद ही, इस प्रकार यातायात नियमों का उल्लंघन करेंगे, तो हम अपनी आने वाली पीढ़ी को क्या सिखाएंगे ??

इसलिए हम सभी लोगों को यातायात नियमों का पालन करना चाहिए,तथा दूसरों को भी इसके लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। हमेशा हेलमेट पहनकर और सीटबेल्ट बांधकर ही वाहन चलाना चाहिए । वाहन चलाते समय न तो फ़ोन पर बात करनी चाहिये, और न ही गाने सुनने चाहिए।
वाहनों की गति को नियंत्रण में रखकर 40 से 50 की स्पीड पर ही चलाना चाहिए।
और जितना हो सके वाहनों का प्रयोग कम से कम करना चाहिए। इस से पेट्रोल और प्रदूषण दोनों में कमी आएगी।  छोटी दूरी की यात्रा पैदल या फिर साईकल से ही करनी चाहिए।

आपकी यात्रा मंगलमय हो ।

आइये हम सब मिलकर परिवर्तन की शुरुवात आज से ही करें ताकि हम अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए एक अच्छे भविष्य का निर्माण कर सके ।

कमेंट के माध्यम से अपने प्यार भरे विचारों और सुझावों से मुझे अवश्य अवगत कराएं ।
आपके विचारों की प्रतीक्षा में ........


Sunday, November 12, 2017

सफर बनारस का : Journey to Varanasi


बहुत दिनों तक लगातार ऑफिस में काम करने के बाद, एक दिन जब हम मिले, तो हमने कहीं घूमने जाने का मन बनाया ताकि हम अपने ऑफिस की थकान को भुलाकर थोड़ा अच्छा और तरोताज़ा महसूस कर सकें, इसीलिए हमने भोलेनाथ की शरण में, बनारस जाने का फैसला किया, और जब हमने घर पर अपने इस फैसले के बारे में बताया, तो घरवाले भी झट से साथ में चलने को तैयार हो गए। 
फिर क्या था, अगले ही दिन मैनें दोनों परिवारों के लिए काशी विश्वनाथ ट्रेन से टिकट बुक कर दी, और फिर मैं और मेरा मित्र सौरभ सक्सेना अपने-अपने परिवार के साथ बनारस के लिए निकल पड़े। रास्ते के लिए मम्मी ने आलू की सब्ज़ी और पूड़ी बना के रख ली थी, और भाई कुरकुरे और बिसकिट्स ले आया था, और सौरभ भाई के घर से भी आंटी पूड़ी सब्ज़ी और नमकीन वगैरह खूब रख लायी थी।
हम लोग समय के पहले ही चारबाग़ स्टेशन पहुँच गये, और थोड़ी देर प्लेटफॉर्म पर इंतज़ार करने के बाद ही, ट्रेन अपने निर्धारित समय से आ गयी, और हम लोग अपनी- अपनी सीट पर बैठ गए और 25 मिनट बाद हमारी ट्रेन बनारस के लिए निकल पड़ी। हम सब लोग आपस मे खूब देर तक बाते करते रहे, फिर सबने पूड़ी सब्ज़ी का आनंद लिया, और फिर सब लेट गए।

मैं और सौरभ घूमने के लिए बहुत अधिक उत्साहित थे, शायद इसीलिए हम दोनों को नींद भी नहीं आयी, हम लोग रात भर घूमने का प्लान बनाते रहे, और सुबह 5 बजे हम लोग बनारस स्टेशन पहुंच गए। स्टेशन से बाहर आकर हम लोगो ने ऑटो किया, और फिर हॉटेल के लिए हमारी तलाश शुरू हुई।
हमें एक ऐसा होटेल चाहिए था, जहाँ पर कमरों में AC लगा हो क्योंकि गर्मी भी पूरे जोर शोर से पड़ रही थी, और जो काशी विश्वनाथ मंदिर के करीब भी हो, ताकि हम लोग आसानी से दर्शन कर सकें। करीब 1 घंटे तक होटल ढूढ़ने के बाद हमारी तलाश पूरी हुई, और हमने मणिकर्णिका घाट के पास एक होटल में दो कमरे ले लिए।


कमरे में पहुँच कर सबने थोड़ी देर आराम किया, और फिर नहा धोकर सब लोग बाबा काशी विश्वनाथ के दर्शन के लिए निकल पड़े, हमारे होटल से मात्र 1 किलोमीटर की दूरी पर ही मंदिर था, इसलिए सबने पैदल घूमते घूमते जाने का फैसला किया। सब लोग घूमते घूमते मंदिर पहुँचे तो देखा दर्शन के लिए 500 मीटर लंबी लाइन लगी है। हम लोग भी उसी लाइन में लग गए। मंदिर का रास्ता बहुत ही संकरा था, जैसे कोई छोटी गली और उसी गली में किनारे- किनारे फूलों और प्रसाद की दुकानें भी लगी थीं, और उसी गली से लोग साईकल और मोटर साईकल लेकर भी गुजर रहे थे। उस गली में खड़ा होना भी मुश्किल हो रहा था, किसी तरह हम लोग धीरे-धीरे आगे बढ़ ही रहे थे, कि अचानक एक व्यक्ति हमारे पास आया, और बोला कि मैं आप लोगों को VIP दर्शन करा सकता हूँ और इसके लिए 400 रुपये प्रति व्यक्ति लगेंगे। 


एक बार हमने सोचा कि कर लेते हैं, जल्दी दर्शन मिल जाएंगे, लेकिन फिर अगले ही पल सोचा की भगवान के दर्शन के लिए क्या सोर्स लगाना, लाइन में लग कर ही चलते हैं। और इस तरह हम लोग आगे बढ़ गए, आगे जाकर देखा तो पता चला, कि वो लोग VIP दर्शन के नाम पर लोगों को पीछे से ले जाकर आगे लाइन में खड़ा कर देते हैं, और पैसे ऐंठ लेते हैं, और वहाँ पर लोंगो की सुरक्षा में खड़े पुलिस वाले भी ऐसे लोगों से सावधान रहने के लिए सभी को जागरूक कर रहे थे। यह सब देखकर हम लोगों ने सोचा कि अच्छा हुआ हम लोग बच गए, और फिर लगभग 2 घंटे लाइन में लगने के बाद, हम सबने बाबा काशी विश्वनाथ के दर्शन किये। 

दोस्तों भीड़ इतनी ज्यादा थी, कि शायद ही, 1 मिनट भी दर्शन किया हो, उसके बाद पुलिस वाले सबको बाहर कर देते। खैर किसी तरह हम सबने अच्छे से दर्शन किये और फिर पूरा मंदिर भी घूमा। दोस्तों मंदिर का शिखर सोने का बना हुआ है, और  दरवाज़ों पर भी बेमिसाल और खूबसूरत नक्कासी की गयी है।
उसके बाद एक अच्छे रेस्तरां में खाना खाकर वापस अपने होटल आ गए। सब लोग लाइन में लगे लगे थक भी गए थे, इसीलिए सब ने थोड़ी देर आराम किया। 


 
उसके बाद लगभग 4 बजे हम लोग घाट घूमने के लिए निकले और टहलते टहलते हम लोग मणिकर्णिका घाट पहुँच गए। दोस्तो वहाँ पहुँच कर हम सब थोड़ी देर के लिए स्तब्ध रह गए। क्या खूबसूरती थी वहाँ की, गंगा नदी अंगड़ाइयां लेते हुए निरंतर बह रही थी, और पूरा घाट लोगों से खचाखच भरा हुआ था। घाट के किनारे किनारे नाव और स्टीमर लगे हुए थे। हम लोगो ने एक स्टीमर बुक किया, और सब लोग उसमे बैठकर सारे घाट घूमने के लिए निकल पड़े।

दोस्तों काशी को घाटों का शहर भी बोला जाता है। स्टीमर में बैठ कर हमने सारे घाटों को देखा, और हमारे स्टीमर चालक ने भी हमे सारे घाटों के बारे में विस्तार से बताया,उसके बाद उसने स्टीमर को नदी के दूसरे किनारे पर लगाया और फिर मैंने और मेरे भाई ने निर्मल गंगा में स्नान भी किया। 
कहा जाता है कि, गंगा में स्नान करने से सारे पाप धुल जाते हैं, तो मैंने सोचा क्यों न मैं भी अपने पाप धुल लूँ। स्नान और सारे घाटों के घूमने के बाद चालक ने हमारे स्टीमर को घाट के नज़दीक लगा दिया, और फिर वहाँ से हमने भव्य गंगा आरती का भी मज़ा लिया।

दोस्तों गंगा आरती देखने के लिए सभी नाव एक साथ घाट के किनारे नदी में लगा दी जाती हैं, और सभी लोग नाव पर बैठ कर ही गंगा आरती में भाग लेते हैं, सभी घाटों पर एक साथ मंत्रोउच्चारण के साथ भव्य आरती की जाती है। उसके बाद सभी लोग दीप और पुष्प मां गंगा को अर्पित कर देते हैं। गंगा आरती देखने के बाद हम लोग खाना खाकर वापस अपने होटल में आ गए।

 
 
अगले दिन सुबह हम सब फिर नई जगह घूमने के लिए उत्सुक थे हम लोगो ने ऑटो बुक किया और फिर भगवान बुद्ध की शरण सारनाथ घूमने के लिए निकल पड़े। सारनाथ में भगवान बुद्ध के स्तूप और एक विशाल प्रतिमा तथा एक संग्रहालय भी  है, जिसमें बुद्धा के जीवन और उनके उपदेशों को दर्शाया गया है यहाँ आकर मन को बहुत शांति महसूस होती है।
उसके बाद हम लोग बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के अंदर बने बिड़ला मंदिर के दर्शन के लिए भी गए। दोस्तों यह एकदम काशी विश्वनाथ मंदिर की तरह ही बना है पर यहां पर सफाई और सुविधाएं वहां से बेहतर हैं। 


फिर हम लोग रामनगर का किला घूमने गए और वहां की मशहूर और स्वादिष्ट चाट भी खाई उसके बाद सब लोग बनारस की मशहूर साड़ियों का कारखाना देखने गए और बनारसी साड़िया कैसे बनाई जाती हैं उसकी भी जानकारी प्राप्त की । उसके बाद सबने बनारस का मशहूर पान खाया और खरीददारी भी की और फिर हम सब लोग रात की ट्रेन से वापस लखनऊ आ गए ।
दोस्तों बनारस घूमने के लिए एक बहुत ही बढ़िया जगह है। ज्यादातर यहां पर विदेशी और दक्षिण भारतीय लोग भारी मात्रा में घूमने आते हैं।
अगर आप भी बनारस घूमने की सोच रहे है, तो 2 से 3 दिन का समय पर्याप्त होगा।

दोस्तों आप लोगों को हमारा सफर कैसा लगा। कमेंट बॉक्स में अपने विचारों के माध्यम से अवश्य अवगत कराएं।
आपका बहुत बहुत आभार ।।।।